Class 9 Hindi - UP
Prose: Upbhoktavad ki Sanskriti
कक्षा 9 उत्तर प्रदेश बोर्ड (UPMSP) की हिंदी पाठ्यपुस्तक के गद्य खंड का यह पाठ 'उपभोक्तावाद की संस्कृति' प्रसिद्ध लेखक श्यामाचरण दुबे द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण निबंध है। इस पाठ में आधुनिक समाज में लगातार बढ़ रही उपभोगवादी संस्कृति और दिखावे की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया गया है। लेखक ने समझाया है कि कैसे बाजारवाद और विज्ञापन हमारे जीवन को नियंत्रित कर रहे हैं और हम सुख-सुविधा की वस्तुओं के गुलाम बनते जा रहे हैं। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे गद्यांश पर आधारित प्रश्न, पाठ के संदेश और वैचारिक बोध से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
उपभोक्तावाद की संस्कृति
यह एक ऐसी जीवनशैली है जहाँ उपभोग (चीजों का इस्तेमाल करना) ही सुख का पैमाना बन गया है और समाज में व्यक्ति की पहचान उसकी वस्तुओं से होने लगी है।
विज्ञापनों का प्रभाव
आज के बाजार में विज्ञापन हमारी आँखों को इस तरह सम्मोहित करते हैं कि हमें उन चीज़ों की भी ज़रूरत महसूस होने लगती है जिनकी वास्तव में हमें कोई आवश्यकता नहीं होती।
बौद्धिक दास्तां
लेखक के अनुसार हम अनजाने में पश्चिमी देशों की सांस्कृतिक गुलामी स्वीकार कर रहे हैं और अपनी मौलिक संस्कृति तथा मूल्यों को भूलते जा रहे हैं।
दिखावे की संस्कृति
समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए लोग सामर्थ्य न होने पर भी अनावश्यक और महँगी वस्तुएं खरीदते हैं, जिससे समाज में दूरी और असंतोष बढ़ रहा है।
गांधी जी का संदेश
महात्मा गांधी चाहते थे कि हम अपनी सांस्कृतिक बुनियाद पर मज़बूत रहें और स्वस्थ तथा तंदुरुस्त बदलावों को अपनाएं, लेकिन उपभोक्ता संस्कृति इसके विपरीत दिशा में ले जा रही है।
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Board Exam Info
उत्तर प्रदेश (UPMSP) कक्षा 9 हिंदी बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या, पाठ के केंद्रीय भाव और लेखक के विचारों पर आधारित लघु उत्तरीय तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रमुख रूप से आते हैं।
Frequently Asked Questions
उपभोक्तावाद की संस्कृति पाठ के लेखक कौन हैं?
'उपभोक्तावाद की संस्कृति' पाठ के लेखक श्यामाचरण दुबे हैं।
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे समाज पर क्या बुरा प्रभाव डाल रही है?
यह संस्कृति हमारे सामाजिक संबंधों को कमजोर कर रही है, दिखावे की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है और हमारी मौलिक संस्कृति को नष्ट कर रही है।
लेखक ने विज्ञापनों के बारे में क्या बताया है?
लेखक का कहना है कि विज्ञापन हमारे मन में यह भावना पैदा करते हैं कि अमुक वस्तु के बिना हमारा जीवन अधूरा है, जिससे हम भ्रमित होकर अनावश्यक खरीदारी करते हैं।
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