Class 9 Hindi - HARYANA
Poetry: Vaakh
कक्षा 9 हरियाणा बोर्ड (BSEH) की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'क्षितिज भाग 1' के अध्याय 'वाख' कश्मीरी कवयित्री ललद्यद द्वारा रचित हैं। 'वाख' का शाब्दिक अर्थ वाणी या कथन है। इस अध्याय में कवयित्री ने बाह्य आडंबरों, पाखंडों और भेदभाव का विरोध करते हुए सच्ची भक्ति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग और आत्मा की शुद्धि पर बल दिया है। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें से कवयित्री के विचारों, वाखों के भावार्थ और काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्न और महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
वाख शैली
यह कश्मीरी भाषा की एक लोकप्रिय शैली है, जो चार पंक्तियों में लिखी जाती है और सीधे दिल को छूती है।
कवयित्री ललद्यद
ये चौदहवीं शताब्दी की प्रसिद्ध कश्मीरी कवयित्री हैं जिन्हें कश्मीर की मीरा भी कहा जाता है और इन्होंने धार्मिक संकीर्णता का विरोध किया।
कच्चे सकोरे की डोर
इसका अर्थ मनुष्य के जीवन की नश्वरता से है, जहाँ कच्चा धागा हमारे कमजोर और नाशवान शरीर व सांसों का प्रतीक है।
सुष्सु और इन्द्रिय निग्रह
योग साधना में हठयोग के माध्यम से सुषुम्ना नाड़ी को जागृत करना और मन की वासनाओं पर नियंत्रण पाना ही सच्ची भक्ति है।
सर्वव्यापक ईश्वर
ईश्वर हर जगह कण-कण में व्याप्त है, इसलिए हिंदू-मुसलमान का भेद मिटाकर उसे अपने भीतर ही खोजना चाहिए।
Important Formulas
Board Exam Info
हरियाणा बोर्ड (BSEH) की कक्षा 9 की हिंदी परीक्षा में इस अध्याय से आमतौर पर 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में काव्यांश का भावार्थ, कवयित्री का परिचय, और 'आई टराह राह गई' या 'जेब टटोलि न पाई' जैसी पंक्तियों के अर्थ पर आधारित लघु उत्तरीय तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न प्रमुख रूप से आते हैं।
Frequently Asked Questions
वाख का शाब्दिक अर्थ 'वाणी' है। यह कश्मीरी भाषा की एक शैली है जिसमें कवयित्री ने अपने आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार व्यक्त किए हैं।
वाख का शाब्दिक अर्थ 'वाणी' होता है, जो कश्मीरी लोक-साहित्य की एक प्रसिद्ध शैली है।
कवयित्री ने 'माझ्य द्वार' किसे कहा है?
कवयित्री ने सुषुम्ना नाड़ी को 'माझ्य द्वार' कहा है, जिसके खुलने पर ही मनुष्य को ईश्वर प्राप्ति का वास्तविक मार्ग मिलता है।
ललद्यद ने सच्चे भक्त की क्या पहचान बताई है?
सच्चा भक्त वह है जो किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है और बाह्य आडंबरों को छोड़कर अपने अंतःकरण को शुद्ध करता है।
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