Class 10 Hindi - GUJARAT
Prose: Naubatkhane Mein Ibadat
ग GSEB कक्षा 10 हिंदी (द्वितीय भाषा) पाठ्यक्रम का पाठ 'नौबतखाने में इबादत' यतीन्द्र मिश्र द्वारा रचित एक प्रसिद्ध व्यक्तिचित्र है। यह पाठ भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के जीवन, उनके संगीत के प्रति समर्पण, और उनके बचपन की यादों पर प्रकाश डालता है। परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चरित्र चित्रण, संगीत संस्कृति और लेखक के उद्देश्य पर आधारित दीर्घ उत्तरीय तथा लघु उत्तरीय प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान
वे विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक थे जिन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।
डुमरांव का महत्व
बिस्मिल्लाह खान का जन्म बिहार के डुमरांव में हुआ था और शहनाई बजाने में उपयोग होने वाली 'रीड' (पर्वी) बनाने के लिए नरकट यहीं की सोन नदी के किनारे पाया जाता है।
काशी और संगीत संस्कृति
काशी संस्कृति की पाठशाला है जहाँ संगीत, धर्म और कला का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जिससे बिस्मिल्लाह खान का गहरा लगाव था।
बाल्यकाल और रियाद
बचपन में बिस्मिल्लाह खान बालाजी के मंदिर में जाकर शहनाई बजाते थे और रियाज के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था।
यतीन्द्र मिश्र की लेखन शैली
लेखक ने बिस्मिल्लाह खान के अंतस की सरलता, संगीत साधना और भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को बहुत ही संवेदनशील ढंग से उकेरा है।
Important Formulas
Board Exam Info
गुजरात बोर्ड (GSEB) की कक्षा 10 की हिंदी परीक्षा में इस पाठ से लगभग 3 से 5 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में मुख्य रूप से बिस्मिल्लाह खान की जीवनशैली, संगीत के प्रति उनका प्रेम और 'नौबतखाने में इबादत' शीर्षक की सार्थकता जैसे प्रश्न सामान्यतः आते हैं।
Frequently Asked Questions
पाठ का शीर्षक 'नौबतखाने में इबादत' का क्या अर्थ है?
'नौबतखाना' वह स्थान है जहाँ बैठकर संगीत बजाया जाता है और 'इबादत' का अर्थ प्रार्थना या उपासना है। इसका अर्थ है कि संगीत ही बिस्मिल्लाह खान के लिए सच्ची इबादत था।
बिस्मिल्लाह खान को शहनाई की प्रेरणा कहाँ से मिलती थी?
उन्हें अपनी संगीत यात्रा और प्रेरणा अपनी रियाज, बालाजी के मंदिर और काशी की सांस्कृतिक परंपराओं से मिलती थी।
बिस्मिल्लाह खान का काशी से क्या संबंध था?
काशी उनके लिए केवल एक शहर नहीं बल्कि संस्कृति की पाठशाला थी, जहाँ संगीत और साम्प्रदायिक सद्भाव की गहरी जड़ें थीं।
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