Class 10 Hindi - GUJARAT
Prose: Balgobin Bhagat
गद्य खंड का पाठ 'बालगोबिन भगत' रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित एक रेखाचित्र है। इस पाठ में एक ऐसे अनोखे चरित्र का वर्णन किया गया है जो कबीर के विचारों को अपने जीवन में पूरी तरह से अपनाता है। बालगोबिन भगत गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी जैसा जीवन जीते हैं और उनके जीवन के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाखंडों पर करारा प्रहार किया गया है। उनके व्यक्तित्व की सरलता, संगीत के प्रति अगाध प्रेम और मानवीय संवेदनाएं विद्यार्थियों को जीवन जीने का एक नया दृष्टिकोण सिखाती हैं। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से इस पाठ से चरित्र-चित्रण और बोधात्मक प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व और रूप
बालगोबिन भगत मझोले कद के गोरे-चिकने व्यक्ति थे, जिनकी उम्र साठ से ऊपर थी। वे सिर पर कबीरपंथी संतों जैसी कनपटी टोपी और गले में तुलसी की जड़ों की माला पहनते थे।
संगीत के प्रति अगाध प्रेम और साधना
भगत जी का संगीत कोई शौक नहीं बल्कि उनकी साधना थी। आषाढ़ की रिमझिम फुहारों में धान की रोपाई करते हुए उनके कंठ से निकले गीत पूरे खेत के माहौल को संगीतबद्ध कर देते थे।
कबीर के आदर्शों का पालन
भगत जी कबीर को साहब मानते थे। खेत में जो भी उपज होती, उसे पहले साहब के दरबार यानी कबीर मठ में ले जाते और प्रसाद रूप में जो मिलता, उसी से गुजारा करते थे।
सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों का विरोध
भगत जी ने समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़ा। उन्होंने अपनी पुत्रवधू से पति की चिता को अग्नि दिलवाई और मृत्यु के अवसर पर रोने के बजाय उत्सव मनाने की बात कही।
मानवीय संवेदनाएं और आत्मीयता
उनका बेटा सुस्त और बोदा था, इसलिए भगत जी उसका विशेष ध्यान रखते थे। बेटे की मृत्यु पर वे रोए नहीं बल्कि कबीर के पदों को गाकर अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की बात कही।
Important Formulas
Board Exam Info
गुजरात बोर्ड (GSEB) की कक्षा 10 की हिंदी परीक्षा में इस अध्याय से आमतौर पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें बालगोबिन भगत की विशेषताएँ, उनके संगीत का प्रभाव, और उनके द्वारा सामाजिक रूढ़ियों के विरोध पर आधारित लघु उत्तरीय तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं।
Frequently Asked Questions
बालगोबिन भगत अपने खेतों की पैदावार को सबसे पहले कहाँ ले जाते थे?
वे अपनी खेत की कुल पैदावार को सिर पर लादकर कबीरपंथी मठ (जो उनके घर से चार कोस दूर था) ले जाते थे और वहाँ प्रसाद रूप में रख देते थे।
बालगोबिन भगत की संगीत साधना का चरमोत्कर्ष कब दिखाई देता है?
उनकी संगीत साधना का चरमोत्कर्ष उस दिन दिखाई दिया जिस दिन उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई थी, और वे मृत शरीर के पास बैठकर मग्न होकर गीत गा रहे थे।
लेखक ने बालगोबिन भगत को 'साधु' क्यों कहा है?
भगत जी गृहस्थ होने के बावजूद किसी भी प्रकार की मोह-माया या लालच में नहीं फंसे, सदा सत्य बोलते थे और कबीर के विचारों को अपने जीवन में जीते थे, इसलिए लेखक ने उन्हें सच्चा साधु माना है।
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