Class 12 Hindi - PUNJAB
Prose: Bazaar Darshan
पाठ 'बाजार दर्शन' प्रसिद्ध निबंधकार जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक वैचारिक निबंध है। इस अध्याय में लेखक ने बाजार के जादू, उसकी उपयोगिता और उसके नकारात्मक प्रभावों का बहुत ही सुंदर विश्लेषण किया है। यह पाठ हमें सिखाता है कि बाजार की चमक-दमक में फंसकर अनावश्यक खरीदारी करने से बचना चाहिए। बाजार का असली उपयोग वही व्यक्ति जानता है जिसे अपनी आवश्यकताओं का सही ज्ञान होता है, अन्यथा बाजार का आकर्षण व्यक्ति को क्रय-शक्ति के गर्व में अंधा कर देता है। पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) की बारहवीं कक्षा की परीक्षा के दृष्टिकोण से यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे प्रतिवर्ष सारांश, सहप्रसंग व्याख्या और तार्किक प्रश्न पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
बाजार का जादू
बाजार की आकर्षण शक्ति को 'बाजार का जादू' कहा गया है, जो रूप और सजावट के माध्यम से ग्राहक की जेब खाली करवा लेता है।
क्रय-शक्ति (Purchasing Power)
पैसे की ताकत जिसके बल पर लोग बाजार में अनावश्यक सामान खरीदते हैं और अपने धन का प्रदर्शन करते हैं।
सार्थक बाजार
वह बाजार जो ग्राहकों को उनकी वास्तविक आवश्यकता की वस्तुएं उपलब्ध कराता है और शोषण या दिखावे को बढ़ावा नहीं देता।
भगत जी का चरित्र
एक चूर्ण बेचने वाले संत प्रवृत्ति के व्यक्ति जो बाजार के आकर्षण से पूरी तरह अछूते रहते हैं और संतोष का संदेश देते हैं।
बाजारूपन
जब बाजार में आवश्यकता की पूर्ति के बजाय केवल कपट, दिखावा और ग्राहकों का शोषण बढ़ने लगता है, तो उसे बाजारूपन कहते हैं।
Important Formulas
Board Exam Info
पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) की कक्षा 12 की हिंदी परीक्षा में इस अध्याय से आमतौर पर 5 से 8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में पाठ का सारांश, गद्यांश की सहप्रसंग व्याख्या, लेखक का परिचय और 'बाजारूपन' व 'बाजार के जादू' से संबंधित लघु उत्तरीय प्रश्न प्रमुख रूप से आते हैं।
Frequently Asked Questions
लेखक ने बाजार के आकर्षण और उसकी सजावट को 'बाजार का जादू' कहा है। यह रूप के जरिए ग्राहक के मन को मोह लेता है और व्यक्ति बिना जरूरत के भी सामान खरीदने को मजबूर हो जाता है।
लेखक ने बाजार के आकर्षण और उसकी सजावट को 'बाजार का जादू' कहा है। यह रूप के जरिए ग्राहक के मन को मोह लेता है और व्यक्ति बिना जरूरत के भी सामान खरीदने को मजबूर हो जाता है।
बाजार का जादू उतरने पर व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
जब बाजार का जादू उतरता है, तब व्यक्ति को समझ आता है कि उसने जो चीजें खरीदी हैं वे उसकी वास्तविक आवश्यकता की नहीं थीं, बल्कि फैंसी और अनावश्यक थीं, जिससे उसे संतोष के बजाय पछतावा होता है।
चूर्ण बेचने वाले भगत जी बाजार के आकर्षण से क्यों बचे रहते हैं?
भगत जी संतोषी स्वभाव के हैं। वे रोज केवल छह आने की कमाई का नियम पूरा करते हैं और बाकी चूर्ण बच्चों को मुफ्त बांट देते हैं। उनका मन खाली (अनावश्यक इच्छाओं से रहित) नहीं होता, इसलिए बाजार का जादू उन पर असर नहीं करता।
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