Class 12 Hindi - MP
Prose: Pahelwaan Ki Dholak
फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित कहानी 'पहलवान की ढोलक' उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण अंचल की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह कहानी महामारी और भूख से जूझते समाज में कला और लोक-संगीत की प्रासंगिकता को दर्शाती है। मुख्य पात्र लूटन सिंह ढोल की थाप से अपने अंदर जीवन की ऊर्जा और संघर्ष करने की शक्ति बनाए रखता है। मध्य प्रदेश बोर्ड (MPBSE) की परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पाठ के केंद्रीय भाव, पात्र के चरित्र-चित्रण और प्रतीकात्मक अर्थों पर आधारित दीर्घ उत्तरीय तथा लघु उत्तरीय प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
लूटन सिंह (पहलवान)
कहानी का मुख्य पात्र जो अनाथ था, कठिनाइयों से जूझकर 'सिंह पहलवान' बना और ढोल की आवाज़ को अपना गुरु मानकर कुश्ती लड़ता था।
ढोलक की भूमिका
ढोलक की थाप ('धिन तिक धा, चित्त लां ढिन') केवल मनोरंजन का साधन नहीं थी, बल्कि यह महामारी से त्रस्त और निराश गाँव के लोगों में जीने की उमंग जगाती थी।
व्यवस्था और लोक-कला की उपेक्षा
नया कमिश्नर आने के बाद व्यवस्था बदलती है और कुश्ती तथा लोक-कलाओं को राजा का संरक्षण मिलना बंद हो जाता है, जिससे पहलवान की स्थिति दयनीय हो जाती है।
महामारी और मानवीय त्रासदी
गाँव में हैजा और मलेरिया फैलने से चारों तरफ मौत का सन्नाटा छा जाता है, जिसे पहलवान अपनी ढोलक की आवाज़ से चुनौती देता है।
व्यवस्था परिवर्तन का प्रभाव
राजगद्दी बदलने के साथ ही पहलवान के दोनों बेटों की महामारी में मृत्यु हो जाती है और अंततः बूढ़े पहलवान की भी उपेक्षा के बीच मृत्यु हो जाती है।
Important Formulas
Board Exam Info
मध्य प्रदेश बोर्ड (MPBSE) परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें गद्यांश की व्याख्या, लेखक का परिचय, 'लूटन पहलवान का चरित्र-चित्रण' और 'ढोलक की आवाज़ का समाज पर प्रभाव' जैसे प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
Frequently Asked Questions
लूटन पहलवान ने ढोलक को अपना गुरु क्यों माना था?
लूटन के माता-पिता की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी और उसने बिना किसी प्रशिक्षक (उस्ताद) के केवल ढोल की थाप से दांव-पेच सीखकर दंगल में जीत हासिल की थी, इसलिए वह ढोलक को ही अपना गुरु मानता था।
गाँव में महामारी फैलने पर ढोलक की क्या भूमिका थी?
महामारी और मौत के साए के बीच पहलवान की ढोलक की आवाज़ सुनसान और डरावनी रात में संजीवनी का काम करती थी। यह लोगों के मन से मृत्यु का भय दूर करती थी और उनमें जीवन जीने की शक्ति जगाती थी।
पहलवान की मृत्यु का अंत कैसे हुआ?
व्यवस्था बदलने और बेटों की मौत के बाद पहलवान अकेला पड़ गया था। एक ठंड भरी रात में उसकी ढोलक की आवाज़ आनी बंद हो गई और सुबह उसका शव चटाई पर मृत पाया गया।
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