Class 10 Hindi - UP
Prose: Balgobin Bhagat
कक्षा 10 हिंदी गद्य खंड का पाठ 'बालगोबिन भगत' रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित एक अनूठा रेखाचित्र है। इस पाठ में लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र को उभारा है जो साधु का बाना पहनने के बजाय अपने आचरण, गृहस्थ जीवन और लोक-संस्कृति के सच्चे स्वरूप से संत था। यह पाठ समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाखंड पर करारा प्रहार करता है और मानवीय संवेदनाओं, संगीत प्रेम तथा प्रकृति के प्रति समर्पण को रेखांकित करता है। यूपी बोर्ड (UPMSP) परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पद्यांश/गद्यांश पर आधारित प्रश्न और चरित्र चित्रण से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व
बालगोबिन भगत मझधार उम्र के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे, जो सिर पर कबीर पंथियों जैसी कनपटी टोपी और गले में तुलसी की जड़ों की माला पहनते थे।
संगीत के प्रति अगाध प्रेम
भगत जी का संगीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि उनकी साधना थी। धान की रोपाई के समय उनके गीत सुनकर सभी की उंगलियां एक साथ थिरकने लगती थीं।
सामाजिक रूढ़ियों का विरोध
भगत जी ने अपने पुत्र की मृत्यु पर रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा और अपनी पतोहू (बहू) से ही चिता को आग दिलवाकर सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया।
लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी की शैली
बेनीपुरी जी की भाषा शैली प्रवाहित, जीवंत और आलंकारिक है जो पात्रों को जीवंत रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है।
मानवीय मूल्य और प्रकृति प्रेम
भगत जी अपनी खेत की सारी फसल कबीर मठ ले जाकर प्रसाद रूप में जो मिलता, उसी से अपना जीवन निर्वाह करते थे, जो उनके त्याग को दर्शाता है।
Important Formulas
Board Exam Info
उत्तर प्रदेश (UPMSP) बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें गद्यांश की व्याख्या, लेखक का जीवन परिचय और 'बालगोबिन भगत की चरित्रगत विशेषताएं' जैसे दीर्घ उत्तरीय प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हैं।
Frequently Asked Questions
बालगोबिन भगत साधु क्यों नहीं कहलाना चाहते थे, जबकि उनमें साधु के सारे गुण थे?
वे कबीर को साहब मानते थे, गृहस्थ जीवन में रहते थे, खेती-बारी करते थे और समाज के बीच रहकर लोक-आचरण का पालन करते थे इसलिए वे खुद को साधु नहीं मानते थे।
बालगोबिन भगत अपनी फसल को सबसे पहले कहाँ ले जाते थे?
वे अपनी खेत की पैदावार का सारा हिस्सा सबसे पहले कबीरपंथी मठ ले जाते थे, जहाँ से जो प्रसाद रूप में मिलता था, उसी से उनका गुजारा होता था।
बेटे की मृत्यु पर बालगोबिन भगत का आचरण सामान्य लोगों से भिन्न क्यों था?
वे रोने के बजाय गाकर उत्सव मनाने को कहते थे क्योंकि उनके अनुसार आत्मा परमात्मा से मिल गई है, जो आनंद का विषय है न कि शोक का।
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