Class 12 Hindi - WEST-BENGAL

Prose: Pahelwaan Ki Dholak

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'पहलवान की ढोलक' व्यवस्था, कला और इंसान के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। यह कहानी महामारी के दौर में एक लोककला और उसके कलाकार 'लुट्टन पहलवान' के जीवन के मार्मिक पतन को बयां करती है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा संसद (WBBSE) के कक्षा 12 के पाठ्यक्रम के लिए यह कहानी मानवीय संवेदना, ग्रामीण समाज के यथार्थ और कला के प्रति निष्ठा को समझने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बोर्ड परीक्षाओं में इस पाठ से चरित्र चित्रण और केंद्रीय भाव पर आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।

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Key Concepts

लुट्टन सिंह (पहलवान)

कहानी का मुख्य पात्र जो अनाथ होने के बाद पहलवानी को अपना जीवन बनाता है और ढोल की थाप पर कुश्ती लड़कर श्यामनगर का 'सिंहल' पहलवान बनता है।

ढोलक की भूमिका

ढोलक की आवाज़ ('धां जिना, गिड़ धां') लुट्टन और पूरे गाँव के लिए निराशा के समय में संजीवनी बूटी का काम करती है, जो जीवन जीने की ऊर्जा जगाती है।

व्यवस्था और लोककला

नए राजा के आते ही पहलवानी और लोककला के संरक्षण की पुरानी व्यवस्था का अंत हो जाता है, जो कला और सत्ता के बदलते समीकरण को दिखाता है।

महामारी और मानवीय त्रासदी

गाँव में हैजा और मलेरिया के प्रकोप के दौरान मौत के सन्नाटे के बीच लुट्टन की ढोलक लोगों में जीने का हौसला बनाए रखती है।

अंतिम संघर्ष

अपने दोनों बेटों की कोरोना/महामारी में मौत के बाद भी लुट्टन का टूटना और अंततः खुद महामारी का शिकार होना, व्यवस्था की क्रूरता को दर्शाता है।

Important Formulas

लोककला: वह कला जो पारंपरिक रूप से किसी समाज या क्षेत्र विशेष के जनमानस द्वारा जीवित रखी जाती है।
यथार्थवाद: साहित्य की वह शैली जिसमें जीवन की वास्तविकताओं और कठिनाइयों का बिना किसी पर्दादारी के चित्रण किया जाता है।
संवेदना: दूसरों के दुखों और परिस्थितियों को गहराई से महसूस करने की मानवीय क्षमता।

Board Exam Info

पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा संसद (WBBSE) की परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 5 से 8 अंकों के प्रश्न आते हैं। इसमें मुख्य रूप से लुट्टन पहलवान का चरित्र चित्रण, ढोलक की आवाज़ का महत्व और कहानी के अंत के निहितार्थ से संबंधित दीर्घ उत्तरीय और लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं।

Frequently Asked Questions

लुट्टन पहलवान ढोलक को अपना गुरु क्यों मानता था?

क्योंकि उसने किसी से कुश्ती के कोई औपचारिक दाँव-पेंच नहीं सीखे थे, बल्कि ढोलक की आवाज़ से प्रेरणा लेकर ही वह अखाड़े में उतरता था और जीत हासिल करता था।

कहानी का अंत इतना दुखद क्यों दिखाया गया है?

यह दिखाने के लिए कि कैसे एक उदासीन व्यवस्था और महामारी एक महान कलाकार और उसकी कला को पूरी तरह से निगल जाती है।

लुट्टन की ढोलक गाँववालों के लिए क्या संदेश देती थी?

वह ढोलक गाँववालों के मन से मौत का डर भगाती थी और उन्हें महामारी के खिलाफ संघर्ष करने की शक्ति देती थी।

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