Class 12 Hindi - RAJASTHAN
Prose: Shram-Vibhajan aur Jaati-Pratha
कक्षा 12 राजस्थान बोर्ड (RBSE) के हिंदी पाठ्यक्रम में सम्मिलित पाठ 'श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा' भारतीय संविधान के निर्माता बाबासाहेब डा. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' का हिंदी रूपांतरण है। इस पाठ में लेखक ने आधुनिक समाज में श्रम-विभाजन के नाम पर फैली जाति-प्रथा की विसंगतियों, कुप्रथाओं और मानवीय स्वतंत्रता पर उसके दुष्प्रभावों का गंभीर विश्लेषण किया है। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से सामाजिक न्याय, समानता और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर आधारित दीर्घ उत्तरीय और लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा में अंतर
लेखक के अनुसार श्रम-विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित होता है, जबकि जाति-प्रथा मनुष्य के जन्म के आधार पर उसका पेशा निर्धारित करती है जो कि अस्वाभाविक है।
लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप
अंबेडकर जी के अनुसार लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।
जाति-प्रथा के दुष्परिणाम
जाति-प्रथा मनुष्य को जीवनभर के लिए एक ही पेशे में बांध देती है, जिससे आपातकालीन स्थितियों में भी व्यक्ति अपना पेशा नहीं बदल सकता और बेरोजगारी उत्पन्न होती है।
सच्चा समाज सुधार
जातिवाद के उन्मुलन के लिए समाज को स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व (भाईचारा) पर आधारित होना चाहिए, जहाँ सभी को अपनी क्षमता विकसित करने के समान अवसर मिलें।
Important Formulas
Board Exam Info
राजस्थान बोर्ड (RBSE) परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें गद्यांश की व्याख्या, लेखक का जीवन परिचय, और पाठ के वैचारिक आधार पर आधारित लघु उत्तरीय व निबंधात्मक प्रश्न प्रमुख रूप से शामिल होते हैं।
Frequently Asked Questions
क्या आधुनिक समाज में श्रम-विभाजन आवश्यक है?
हाँ, आधुनिक समाज में कार्यकुशलता और सुचारू संचालन के लिए श्रम-विभाजन आवश्यक है, लेकिन यह जाति के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति की योग्यता और रुचि के आधार पर होना चाहिए।
जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का प्रमुख कारण कैसे बनती है?
जाति-प्रथा मनुष्य को पूर्व निर्धारित पेशे से बांध देती है। यदि उद्योग-धंधों या तकनीक में बदलाव आ जाए और व्यक्ति का पेशा बंद हो जाए, तब भी वह दूसरा पेशा नहीं चुन सकता क्योंकि वह जातिगत बंधन में बंधा होता है, जिससे भुखमरी और बेरोजगारी की समस्या पैदा होती है।
बाबासाहेब अंबेडकर के अनुसार एक आदर्श समाज के क्या तीन मुख्य तत्व हैं?
अंबेडकर जी के अनुसार एक आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व (भाईचारा) के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।
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