Class 12 Hindi - RAJASTHAN
Prose: Pahelwaan Ki Dholak
फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी 'पहलवान की ढोलक' व्यवस्था की क्रूरता, अमानवीयता और कला व जीवन के संघर्ष को दर्शाती है। यह कहानी महामारी (हैजा और मलेरिया) के दौर में दंगल जीतने वाले पहलवान लुकमान सिंह (लुटन सिंह) के जीवन संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें ढोलक की आवाज़ को एक संजीवनी बूटी के रूप में दिखाया गया है जो गांव के लोगों में जीवन का संचार करती है। राजस्थान बोर्ड (RBSE) परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे चरित्र चित्रण, प्रतीकात्मकता और गद्यांश आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
लुटन सिंह का अतीत और प्रेरणा
बचपन में माता-पिता की मृत्यु और सास द्वारा पालन-पोषण के बाद कुश्ती के प्रति उसका आकर्षण और 'संन्यासी पहलवान' चाँद सिंह को हराना।
ढोलक की आवाज़ और उसका महत्व
ढोलक की आवाज़ ('धा रक्ता गिधा रक्ता') महामारी के समय गांव के निराश लोगों में जीवन शक्ति और संघर्ष करने का हौसला जगाती थी।
व्यवस्था परिवर्तन और पहलवान की उपेक्षा
राजगद्दी बदलने और नए साहब (विलायती संस्कृति प्रेमी) के आने के बाद पहलवान और उसकी कला की उपेक्षा, जिससे वह भुखमरी के कगार पर पहुँच गया।
पितृत्व और सहनशीलता
अपने दोनों जवान बेटों की महामारी में मृत्यु के बावजूद टूटे बिना ढोलक बजाना और अंत तक अपनी कला के प्रति समर्पित रहना।
कहानी की प्रतीकात्मकता
ढोलक की आवाज़ मृतप्राय समाज में चेतना का प्रतीक है, और लुटन सिंह शोषित व उपेक्षित लोक-कलाकार का जीवंत प्रतीक है।
Important Formulas
Board Exam Info
राजस्थान बोर्ड (RBSE) परीक्षा में इस पाठ से लगभग 4-6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें से मुख्य रूप से व्याख्या (गद्यांश), लघुउत्तरात्मक प्रश्न (जैसे: ढोलक की आवाज़ का प्रभाव, लुटन पहलवान का चरित्र) तथा निबंधात्मक प्रश्न आने की संभावना अधिक होती है।
Frequently Asked Questions
पहलवान की ढोलक कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
यह कहानी विपरीत परिस्थितियों में जीवन के संघर्ष और लोक-कला के महत्व को दर्शाती है।
लुटन सिंह को 'पहलवान' की उपाधि कैसे मिली?
लुटन ने अपने गुरु की प्रेरणा और ढोलक की थाप से कुश्ती के दांव-पेंच सीखकर दंगल में प्रसिद्ध पहलवान चाँद सिंह को हराकर यह उपाधि प्राप्त की।
कहानी के अंत में ढोलक की आवाज़ क्यों बंद हो गई?
जब महामारी की चपेट में आकर लुटन सिंह की भी मृत्यु हो जाती है, तो उसके साथ ही उसकी जीवन-संगिनी ढोलक की आवाज़ भी हमेशा के लिए बंद हो जाती है।
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