Class 12 Hindi - KARNATAKA
Prose: Shram-Vibhajan aur Jaati-Pratha
कक्षा 12 कर्नाटक बोर्ड (KSEEB) के हिंदी पाठ्यक्रम के अंतर्गत 'श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा' बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण 'एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट' का हिंदी रूपांतरण है। इस पाठ में लेखक ने भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा और उसके आधार पर होने वाले श्रम-विभाजन की कड़ी आलोचना की है। अंबेडकर जी बताते हैं कि जाति-प्रथा मनुष्य की रुचि का ध्यान रखे बिना उसका श्रम-विभाजन करती है, जो अस्वाभाविक है। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे सामाजिक न्याय, लोकतंत्र के स्वरूप और समानता से जुड़े दीर्घ उत्तरीय और व्याख्यात्मक प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा का संबंध
लेखक के अनुसार, जाति-प्रथा केवल श्रम-विभाजन नहीं है, बल्कि यह सभ्य समाज में श्रम-विभाजन का एक अस्वाभाविक रूप भी है क्योंकि यह मनुष्यों की व्यक्तिगत रुचि और क्षमता की उपेक्षा करती है।
जाति-प्रथा के दुष्परिणाम
जाति-प्रथा मनुष्य को जीवनभर के लिए एक पेशे में बांध देती है, भले ही परिस्थिति या उसकी रुचि क्यों न बदल जाए। इससे व्यक्ति की कार्य-क्षमता और प्रेरणा नष्ट हो जाती है।
लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप
डॉ. अंबेडकर के अनुसार, एक आदर्श समाज वह है जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता का भाव हो। लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जीवनचर्या और समाज के अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है।
पैतृक पेशे का बंधन
हिंदू धर्म की जाति-प्रथा व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसकी रुचि का हो, बल्कि उसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पहले से ही पेशा चुनने के लिए मजबूर करती है।
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Board Exam Info
कर्नाटक (KSEEB) कक्षा 12 हिंदी बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 5 से 8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में इस अध्याय से संदर्भ सहित व्याख्या, लेखक का परिचय, निबंधात्मक प्रश्न (जैसे- जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं है?) और वस्तुनिष्ठ प्रश्न प्रमुखता से आते हैं।
Frequently Asked Questions
लेखक डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा में क्या अंतर है?
श्रम-विभाजन किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता है जो व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होता है, जबकि जाति-प्रथा मनुष्य की रुचि की उपेक्षा कर जन्म के आधार पर श्रम का अस्वाभाविक विभाजन करती है।
इस पाठ का मूल उद्देश्य क्या है?
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को उजागर करना और एक ऐसे समतावादी समाज की स्थापना करना है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर आधारित हो।
बोर्ड परीक्षा के लिए इस पाठ से किस प्रकार के प्रश्न महत्वपूर्ण हैं?
बोर्ड परीक्षा में 'जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी का प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बन गई है?' और 'आदर्श समाज की विशेषताएं' जैसे विषयक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
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