Class 9 Hindi - ODISHA
Poetry: Vaakh
कक्षा 9 ओडिशा बोर्ड (BSE) के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल 'वाख' कश्मीरी कवयित्री ललद्यद की प्रसिद्ध रचना है। 'वाख' का शाब्दिक अर्थ वाणी या कथन है। इस अध्याय में कवयित्री ने बाह्य आडंबरों, रूढ़ियों और भेदभाव का कड़ा विरोध करते हुए सच्ची भक्ति, आत्म-ज्ञान और ईश्वर प्राप्ति के सरल मार्गों पर प्रकाश डाला है। ललद्यद ने अपने इन पदों के माध्यम से यह समझाया है कि भगवान हर जगह हैं और मनुष्य को अपने भीतर झाँकने की आवश्यकता है। बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कवयित्री के जीवन, पदों के भावार्थ और केंद्रीय विचारों पर आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
वाख का अर्थ
वाख कश्मीरी भाषा की एक शैली है जिसका अर्थ 'वाणी' या 'कथन' होता है, जैसे हिंदी में दोहा या पद।
कवयित्री ललद्यद का परिचय
ललद्यद कश्मीरी भाषा की लोकप्रिय संत कवयित्री थीं, जिन्होंने धार्मिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भक्ति का संदेश दिया।
भवसागर और कच्चा सकोरा
कवयित्री ने जीवन की नश्वरता को 'कच्चे सकोरे' के रूप में दर्शाया है, जिस पर पड़ी पानी की हर बूंद (समय) उसे गला रही है।
सुषम्ना नाड़ी और हठयोग
योग साधना के माध्यम से मन को नियंत्रित करने और सुषम्ना नाड़ी को जागृत करने का उल्लेख किया गया है।
समभावी होना
ईश्वर प्राप्ति के लिए मनुष्य को सुख-दुख, मान-अपमान आदि में एकसमान (समभावी) रहना चाहिए, तभी मुक्ति संभव है।
Important Formulas
Board Exam Info
ओडिशा बोर्ड (BSE) की कक्षा 9 की हिंदी परीक्षा में इस अध्याय से आमतौर पर 3 से 5 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में वाक्यों का आशय स्पष्ट करने वाले प्रश्न, कवयित्री के विचारों पर आधारित दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और शब्दों के अर्थ से जुड़े बहुविकल्पीय प्रश्न प्रमुख रूप से आते हैं।
Frequently Asked Questions
वाख से आप क्या समझते हैं?
वाख कश्मीरी शैली के छोटे छंद या पद हैं जिनमें कवयित्री ललद्यद ने जीवन, भक्ति और ईश्वर प्राप्ति के अपने विचार व्यक्त किए हैं।
कवयित्री ने 'कच्चे धागे की रस्सी' किसे कहा है?
कवयित्री ने मनुष्य के जीवन और सांसारिक प्रयासों को 'कच्चे धागे की रस्सी' कहा है जो बहुत कमजोर और क्षणभंगुर होते हैं।
समभावी होने से क्या तात्पर्य है?
समभावी होने का अर्थ है कि मनुष्य को भेदभाव छोड़कर सभी परिस्थितियों (सुख-दुख) में समान भाव रखना चाहिए, तभी उसके मन के द्वार खुलते हैं।
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