Class 7 Hindi - HARYANA
Phool Aur Kaanta
कक्षा 7 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'वसंत भाग 2' का पाठ 'फूल और काँटा' अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक कविता है। इस कविता के माध्यम से कवि ने यह समझाया है कि एक ही पौधे पर जन्म लेने वाले फूल और काँटे का स्वभाव और आचरण कितना भिन्न होता है। फूल अपनी सुंदरता और सुगंध से सभी को आकर्षित करता है और सबको सुख देता है, जबकि काँटा दूसरों को कष्ट पहुँचाता है। यह पाठ विद्यार्थियों को सिखाता है कि कुल या परिवार में जन्म लेने से कोई महान नहीं बनता, बल्कि अपने अच्छे कर्मों और व्यवहार से ही इंसान समाज में आदरणीय बनता है। बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से यह पाठ नैतिक मूल्यों और आशय स्पष्ट करने वाले प्रश्नों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
Start Learning FreeKey Concepts
समान उद्गम, भिन्न स्वभाव
फूल और काँटा दोनों एक ही पौधे, एक ही धरती और एक ही हवा-पानी में पलते हैं, फिर भी दोनों के स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
फूल की परोपकारी प्रकृति
फूल अपनी महक और सुंदर रूप से सबका मन मोह लेता है, तितलियों को गोद में लेता है, भंवरों को रस पिलाता है और देवताओं के चरणों में भी स्थान पाता है।
काँटे की कष्टदायक प्रकृति
काँटा दूसरों की उंगलियों में चुभकर उन्हें घायल कर देता है, सुंदर वस्त्रों को फाड़ देता है और भौरे के पंख कतर देता है, जो उसके कठोर स्वभाव को दर्शाता है।
कर्मों का महत्व (बड़प्पन)
कवि कहते हैं कि बड़प्पन किसी ऊंचे कुल में जन्म लेने से नहीं मिलता, बल्कि इंसान की पहचान उसके अच्छे कर्मों और परोपकारी व्यवहार से होती है।
Important Formulas
Board Exam Info
हरियाणा बोर्ड (BSEH) की परीक्षा में इस पाठ से आमतौर पर 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से कविता की पंक्तियों का आशय स्पष्ट करना, काँटे और फूल के व्यवहार में अंतर बताना और पाठ के केंद्रीय भाव से जुड़े प्रश्न शामिल होते हैं।
Frequently Asked Questions
फूल और काँटे का जन्म कहाँ होता है?
फूल और काँटे दोनों का जन्म एक ही पौधे पर होता है और उनका पालन-पोषण एक जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों (धूप, हवा, पानी) में होता है।
किसे देखकर सभी के चेहरे खिल उठते हैं?
फूल की सुंदरता और उसकी भीनी-भीनी खुशबू को देखकर सभी लोगों के चेहरे खिल उठते हैं।
इस कविता से हमें क्या मुख्य शिक्षा मिलती है?
इस कविता से यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा फूल की तरह परोपकारी बनना चाहिए और अपने अच्छे कर्मों से दूसरों को सुख देना चाहिए, न कि काँटे की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाना चाहिए।
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