Class 6 Hindi - KARNATAKA
Pariksha
कक्षा 6 कर्नाटक बोर्ड (KSEEB) की हिंदी पाठ्यपुस्तक का पाठ 'परीक्षा' प्रेमचंद जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रेरणादायक कहानी है। यह पाठ शिक्षा, बुद्धिमत्ता और कर्मठता के सच्चे अर्थ को उजागर करता है। कहानी में सुजानगढ़ के दीयादान देवगढ़ के दीवान सुजानसिंह अपनी वृद्धावस्था में एक योग्य उत्तराधिकारी की तलाश करते हैं। इसके लिए वे एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते हैं जिसमें उम्मीदवारों की ईमानदारी, परोपकार और मानवीय मूल्यों की परख की जाती है। यह पाठ बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्य और गद्यांश पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
दीवान सुजानसिंह का चरित्र
सुजानसिंह एक अनुभवी, कर्तव्यनिष्ठ और दूरदर्शी दीवान थे जो अपने राज्य के लिए सबसे योग्य और ईमानदार उत्तराधिकारी चुनना चाहते थे।
अनोखी परीक्षा
सुजानसिंह ने उम्मीदवारों की परीक्षा लेने के लिए जानबूझकर एक झूठी दुर्घटना का नाटक रचा, ताकि उनकी असली इंसानियत और परोपकार की भावना को परखा जा सके।
पंडित जानकीनाथ की ईमानदारी
पंडित जानकीनाथ ने अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना एक गरीब किसान कीचड़ में फंसी गाड़ी निकालने में मदद की, जिससे उनकी ईमानदारी और दयालुता साबित हुई।
सच्ची परीक्षा का उद्देश्य
पाठ का मुख्य संदेश यह है किताबी ज्ञान या पद से बढ़कर इंसान के नैतिक गुण, परोपकार और संकट के समय दूसरों की मदद करना ही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा है।
Important Formulas
Board Exam Info
कर्नाटक बोर्ड (KSEEB) की परीक्षाओं में इस पाठ से आमतौर पर 5 से 8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। मुख्य प्रश्नों में गद्यांश आधारित प्रश्न, चरित्र चित्रण (सुजानसिंह या जानकीनाथ), और पाठ के संदेश से जुड़े लघु उत्तरीय प्रश्न शामिल होते हैं।
Frequently Asked Questions
सुजानसिंह ने उत्तराधिकारी चुनने के लिए कौन सी परीक्षा ली थी?
सुजानसिंह ने उम्मीदवारों की परीक्षा लेने के लिए एक कीचड़ भरे रास्ते पर गाड़ी फंसने का नाटक रचा था, जहाँ उन्होंने देखा कि कौन सा उम्मीदवार अपनी शान छोड़कर गरीब किसान की मदद करता है।
दीवान पद के लिए अंत में किसका चयन हुआ?
दीवान पद के लिए पंडित जानकीनाथ का चयन हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी परवाह किए बिना संकट में फंसे किसान की मदद की थी।
इस पाठ 'परीक्षा' से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य की असली परीक्षा उसके संकट के समय किए गए कर्मों, ईमानदारी और परोपकार की भावना से होती है।
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