Class 12 Hindi - ODISHA
Prose: Shram-Vibhajan aur Jaati-Pratha
कक्षा 12 ओडिशा बोर्ड (BSE) के लिए 'श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा' पाठ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' का हिंदी अनुवाद है। इस पाठ में लेखक ने भारतीय समाज में जाति-प्रथा और श्रम-विभाजन के कुप्रभावों का गहराई से विश्लेषण किया है। यह पाठ बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, समानता और मानवीय स्वतंत्रता जैसे गंभीर विषयों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में इस पाठ से वैचारिक और तथ्यात्मक दोनों प्रकार के प्रश्न आते हैं, जो विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता को परखते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा का संबंध
लेखक बताते हैं कि श्रम-विभाजन सभ्य समाज की आवश्यकता है, लेकिन जाति-प्रथा मनुष्य की रुचि और क्षमता पर ध्यान दिए बिना जन्म के आधार पर उसका श्रम निश्चित कर देती है, जो अस्वाभाविक है।
जाति-प्रथा एक अरुचिकर कार्य
जाति-प्रथा के कारण मनुष्य को ऐसा काम चुनना पड़ता है जिसमें उसकी रुचि न हो, जिससे वह काम टालने की प्रवृत्ति और कम कार्यक्षमता का शिकार हो जाता है।
लोकतंत्रीय समाज की रूपरेखा
एक आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व पर आधारित होना चाहिए, जहाँ समाज में इतनी गतिशीलता हो कि कोई भी परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक आसानी से पहुँच सके।
जात-पाँत तोड़क मंडल का भाषण
यह पाठ मूल रूप से लाहौर में 1936 में होने वाले 'जात-पाँत तोड़क मंडल' के वार्षिक सम्मेलन के लिए तैयार किया गया था, जिसे अत्यधिक क्रांतिकारी माने जाने के कारण रद्द कर दिया गया था।
भाईचारे का वास्तविक अर्थ
लेखक के अनुसार लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम ही लोकतंत्र है।
Important Formulas
Board Exam Info
ओडिशा (BSE) बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से आमतौर पर 5 से 8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs), अति लघु उत्तरीय प्रश्न और दीर्घ उत्तरीय विश्लेषणात्मक प्रश्न शामिल होते हैं, जैसे 'जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं है?' या 'लेखक ने आदर्श समाज के किन तीन तत्वों का उल्लेख किया है?'।
Frequently Asked Questions
क्या श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा दोनों एक ही चीज़ हैं?
नहीं, श्रम-विभाजन किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता है जो कार्यकुशलता के लिए किया जाता है, जबकि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ मनुष्य की जाति और जन्म के आधार पर जबरन काम थोपती है।
लेखक ने जाति-प्रथा को मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा के विरुद्ध क्यों कहा है?
क्योंकि जाति-प्रथा व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि, क्षमता और इच्छा का विचार किए बिना उसका पेशा जन्म से ही तय कर देती है, जिससे वह जीवनभर अवांछित कार्य करने के लिए विवश हो जाता है।
ओडिशा बोर्ड परीक्षा के लिए इस पाठ से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कौन सा है?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि 'जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी और भुखमरी का एक प्रमुख कारण कैसे बन गई है?' तथा 'आदर्श समाज की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?'।
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