Class 11 Hindi - ANDHRA-PRADESH
Supplementary: Rajasthan Ki Rajat Boondein
कक्षा 11 आंध्र प्रदेश (BSEAP) बोर्ड के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल 'राजस्थान की रजत बूंदें' अनुपम मिश्र द्वारा रचित एक संस्मरणात्मक रिपोर्टाज है। यह पाठ राजस्थान के मरुस्थल में पानी की कमी से निपटने के लिए अपनाई जाने वाली पारंपरिक और अद्भुत जल-संरक्षण तकनीक 'कुई' (बेहद संकीर्ण कुआँ) के निर्माण और उसके महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें चंडीगर्दी, रेजाणि, और पालरपानी जैसे जल विज्ञान से जुड़े स्थानीय शब्दों का गहराई से वर्णन किया गया है। बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से यह पाठ विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण, जल संकट और प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Start Learning FreeKey Concepts
कुई (Kui)
मरुस्थल में भूजल को प्राप्त करने के लिए खोदा जाने वाला अत्यंत संकीर्ण और गहरा गड्ढा, जो व्यास में बहुत छोटा होता है लेकिन गहराई काफी होती है।
पालरपानी (Palarpani)
वर्षा का वह सीधा जल जो नदी, तालाब या अन्य स्रोतों में बहने के बजाय सीधे रूप में प्राप्त किया जाता है, यह जल का सबसे शुद्ध रूप माना जाता है।
पाताळपानी (Patalpani)
वह भूजल जो वर्षा के जल के रूप में भूमि में रिसकर बहुत नीचे चला जाता है और कुओं या नलकूपों के माध्यम से निकाला जाता है।
रेजाणि (Rejani)
रेत के नीचे नमी की एक विशेष परत जो वर्षा के जल को नीचे जाने से रोकती है और कुई द्वारा पानी सोखने में मदद करती है।
चेजाण और चेजाणू (Chejan & Chejanu)
कुई की चिनाई करने का विशेष कार्य जो कुशल कारीगरों यानी 'चेजा़रों' द्वारा किया जाता है ताकि रेत ढहे नहीं।
Important Formulas
Board Exam Info
आंध्र प्रदेश (BSEAP) कक्षा 11 हिंदी बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 4 से 6 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में पाठ के केंद्रीय भाव, 'कुई' निर्माण की प्रक्रिया, और जल संकट से जुड़े वैचारिक तथा लघु उत्तरीय प्रश्न अधिक आते हैं।
Frequently Asked Questions
कुई और सामान्य कुएँ में क्या अंतर है?
सामान्य कुआँ व्यास में चौड़ा होता है और भूजल स्तर तक पहुँचता है, जबकि कुई का व्यास बहुत छोटा होता है और यह मरुस्थल में 'रेजाणि' पानी को संग्रहित करने के लिए बनाई जाती है।
चेजा़र किन्हें कहा जाता है?
चेजा़र उन विशेष और कुशल कारीगरों को कहा जाता है जो कुई की खुदाई और पत्थर या लकड़ी से उसकी मजबूत चिनाई (चेजाण) का कठिन कार्य करते हैं।
यह पाठ पर्यावरण संरक्षण का संदेश कैसे देता है?
यह पाठ हमें सिखाता है कि कैसे प्राचीन राजस्थानी समाज ने प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर न्यूनतम संसाधनों में पानी जैसी अमूल्य संपत्ति का स्थायी प्रबंधन किया था।
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