Class 10 Hindi - RAJASTHAN
Prose: Naubatkhane Mein Ibadat
अध्याय नौ 'नौबतखाने में इबादत' यतीन्द्र मिश्र द्वारा रचित एक प्रसिद्ध व्यक्तिचित्र (स्मृति-चित्र) है, जो भारत रत्न से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, संगीत साधना, और उनकी संस्कृति पर आधारित है। यह पाठ हमें बताता है कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि एक साधना और 'इबादत' है। इसमें खाँ साहब के बचपन, काशी से उनके लगाव, और बालाजी के मंदिर के नौबतखाने से जुड़े उनके शुरुआती दिनों का सुंदर वर्णन किया गया है। राजस्थान बोर्ड (RBSE) परीक्षा की दृष्टि से यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिससे चरित्र-चित्रण और मूल्यपरक प्रश्न पूछे जाते हैं।
Start Learning FreeKey Concepts
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व
बिस्मिल्ला खाँ सादगी, संगीत के प्रति समर्पण, और धार्मिक सौहार्द के प्रतीक थे जो काशी और बालाजी के मंदिर से गहराई से जुड़े थे।
नौबतखाने का अर्थ
नौबतखाना वह स्थान होता है जहाँ बैठकर मंगल अवसरों पर शहनाई या अन्य वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं, विशेषकर मंदिरों के प्रवेश द्वार पर।
काशी और संगीत की परंपरा
काशी संस्कृति की पाठशाला है, जहाँ बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई वादन की कला को मूँज और रीढ़ (reed) के माध्यम से परिष्कृत किया।
सुशीर वाद्य और शहनाई
शहनाई को 'सुशीर वाद्य' (फूँक कर बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों) में शाह माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति प्रख्यात संगीत सम्राटों के यहाँ हुई।
संगीत साधना और इबादत
लेखक ने बताया है कि खाँ साहब के लिए संगीत ही भगवान की सच्ची इबादत थी, जिसमें रियाज और अनुशासन सर्वोपरि था।
Important Formulas
Board Exam Info
राजस्थान बोर्ड (RBSE) कक्षा 10 हिंदी परीक्षा में इस पाठ से सामान्यतः 3 से 5 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जीवन-दर्शन, काशी का सांस्कृतिक महत्व, और पाठ के शीर्षक 'नौबतखाने में इबादत' की सार्थकता पर आधारित दीर्घ उत्तरीय तथा लघु उत्तरीय प्रश्न अक्सर आते हैं।
Frequently Asked Questions
पाठ का नाम 'नौबतखाने में इबादत' क्यों रखा गया है?
क्योंकि बिस्मिल्ला खाँ अपने संगीत को ही खुदा की इबादत (प्रार्थना) मानते थे और उनके जीवन का शुरुआती संगीत अभ्यास मंदिरों के नौबतखाने से जुड़ा था।
बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था और उनका संगीत से क्या संबंध था?
उनका जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था और वे जीवनभर शहनाई को समर्पित रहे।
काशी को संस्कृति की पाठशाला क्यों कहा गया है?
क्योंकि काशी में संगीत, कला, धर्म और उत्सवधर्मिता का अनूठा संगम है जहाँ बिस्मिल्ला खाँ जैसे कलाकारों ने अपनी कला को सींचा।
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